स्वस्मिन् स्थितः सः स्वस्थः
(मामाता के उदर में प्रकृति शिशु का निर्माण एवं लालन - पालन करती है । उदर से बाहर आने पर प्रकृति प्रदत्त स्वस्थता बनाबनाये रखने पर मानव स्वस्थ रहता है । )
- ऋग्वेद
ब्रह्म मुहूर्ते अतिष्ठेत् स्वास्थो रक्षार्थ मानुषः
( ब्रह्म मुहूर्त को उठना स्वास्थ्य हितकारी है । )
- ऋग्वेद
धियो यो नः प्रचोदयात्
( हमारी बुद्धि तेज निरन्तर आगे बढे । )
- यजुर्वेद
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः
( विश्व में सभी नीरोग सुखी हों । )
- यजुर्वेद
शरदं शतं जीवेमः
( सुख-दुःखकारी सर्दी और वर्षा, तपनकारी गर्मी के सौ वर्ष नहीं, अपितु हम शरीर पोषक एवं अमृत वर्षा करने वाली शरद ऋतु के सौ वर्ष जीवित रहें । )
- अथर्ववेद
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