Tuesday, 17 March 2015

Hello


       
         स्वस्मिन् स्थितः सः स्वस्थः
(मामाता के उदर में प्रकृति शिशु का निर्माण एवं लालन - पालन करती है । उदर से बाहर आने पर प्रकृति प्रदत्त स्वस्थता बनाबनाये रखने पर मानव स्वस्थ रहता है । )
                                       - ऋग्वेद

      ब्रह्म मुहूर्ते अतिष्ठेत् स्वास्थो रक्षार्थ मानुषः
( ब्रह्म मुहूर्त को उठना स्वास्थ्य हितकारी है । )
                                       - ऋग्वेद

         धियो यो नः प्रचोदयात्
( हमारी बुद्धि तेज निरन्तर आगे बढे । )
                                       - यजुर्वेद

   सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः
      ( विश्व में सभी नीरोग सुखी हों । )
                                      - यजुर्वेद

             शरदं शतं जीवेमः
( सुख-दुःखकारी सर्दी और वर्षा, तपनकारी गर्मी के सौ वर्ष नहीं, अपितु हम शरीर पोषक एवं अमृत वर्षा करने वाली शरद ऋतु के सौ वर्ष जीवित रहें । )
                                    - अथर्ववेद

भारत की वेद वाणी


       
         स्वस्मिन् स्थितः सः स्वस्थः
(मामाता के उदर में प्रकृति शिशु का निर्माण एवं लालन - पालन करती है । उदर से बाहर आने पर प्रकृति प्रदत्त स्वस्थता बनाबनाये रखने पर मानव स्वस्थ रहता है । )
                                       - ऋग्वेद

      ब्रह्म मुहूर्ते अतिष्ठेत् स्वास्थो रक्षार्थ मानुषः
( ब्रह्म मुहूर्त को उठना स्वास्थ्य हितकारी है । )
                                       - ऋग्वेद

         धियो यो नः प्रचोदयात्
( हमारी बुद्धि तेज निरन्तर आगे बढे । )
                                       - यजुर्वेद

   सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः
      ( विश्व में सभी नीरोग सुखी हों । )
                                      - यजुर्वेद

             शरदं शतं जीवेमः
( सुख-दुःखकारी सर्दी और वर्षा, तपनकारी गर्मी के सौ वर्ष नहीं, अपितु हम शरीर पोषक एवं अमृत वर्षा करने वाली शरद ऋतु के सौ वर्ष जीवित रहें । )
                                    - अथर्ववेद

Sunday, 15 March 2015

Sravan somvar vart katha


श्रावण सोमवार व्रत कथा
शिव शक्ति की सोमवार व्रत कथा

कथा के अनुसार अमरपुर नगर में एक
धनी व्यापारी रहता था। दूर-दूर तक
उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर में उस
व्यापारी का सभी लोग मान-सम्मान करते थे।
इतना सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी अंतर्मन
से बहुत दुखी था क्योंकि उस
व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था।
दिन-रात उसे एक
ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के
बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-
संपत्ति को कौन संभालेगा।
पुत्र पाने की इच्छा से वह
व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव
की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल
को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान
शिव के सामने घी का दीपक
जलाया करता था।
उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन
पार्वती ने भगवान शिव से कहा- 'हे प्राणनाथ,
यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने
दिनों से यह सोमवार का व्रत और
पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस
व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।'
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- 'हे पार्वती!
इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल
की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते
हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।'
इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने
आग्रह करते हुए कहा- 'नहीं प्राणनाथ!
आपको इस
व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी।
यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार
आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-
अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय
भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-
प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।'
पार्वती का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने
कहा- 'तुम्हारे आग्रह पर मैं इस
व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान
देता हूं। लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक
जीवित नहीं रहेगा।'
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस
व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-
प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16
वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।
भगवान के वरदान से
व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र
की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर
दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार
का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने
पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र
जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत
धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह
मनाया गया।
व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक
खुशी नहीं हुई क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के
रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में
किसी को नहीं मालूम था। विद्वान
ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम अमर रखा।
जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे
वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने
अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और
कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए
वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के
साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया।
रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद
रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते
और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।
लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में
पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह
की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था।
निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर
का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के
कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय
सता रहा था कि राजा को इस बात
का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इनकार न
कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क
में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस
लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह
करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर
विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में
ले जाऊंगा।
वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से
बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के
पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर
को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर
राजकुमारी चंद्रिका से विवाह
करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर
राजकुमारी को विदा किया।
अमर जब लौट रहा था तो सच
नहीं छिपा सका और उसने
राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया-
'राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह
तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में
शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस
नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।'
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ
पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार
कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर
राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर
अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच
गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।
जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक
यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर
ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न,
वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में
सो गया। शिव के वरदान के अनुसार
शयनावस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए।
सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-
पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर
दुःख प्रकट करने लगे।
मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से
गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने
भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा-
'प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन
नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर
करें।'
भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में
समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से
बोले- 'पार्वती! यह
तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष
की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु
तो पूरी हो गई।'
पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन
किया- 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के
को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-
पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने
प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के
का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से
सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग
लगा रहा है।' पार्वती के आग्रह करने पर भगवान
शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान
दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ
बैठा।
शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने
नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए
उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ
था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन
किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ
का आयोजन देखा।
राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ
समाप्त होने पर राजा अमर और उसके
मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल
में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के
साथ विदा किया।
रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से
सैनिकों को भी साथ भेजा। दीपचंद ने नगर में
पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन
की सूचना भेजी। अपने बेटे अमर के जीवित वापस
लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक
कमरे में बंद कर रखा था। भूखे-प्यासे रहकर
व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे
की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर
रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु
का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण
त्याग देंगे।
व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ
नगर के द्वार पर पहुंचा। अपने बेटे के विवाह
का समाचार सुनकर, पुत्रवधू
राजकुमारी चंद्रिका को देखकर
उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात
भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर
कहा- 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने
और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र
को लंबी आयु प्रदान की है।' व्यापारी बहुत
प्रसन्न हुआ।
सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में
खुशियां लौट आईं। शास्त्रों में लिखा है
कि जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत
करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं
पूरी होती हैं।

Ekadasi vart katha

जया एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर बोले - हे भगवन्! आपने माघ के
कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का अत्यन्त
सुंदर वर्णन किया। आप स्वदेज, अंडज, उद्भिज और
जरायुज चारों प्रकार के जीवों के उत्पन्न, पालन
तथा नाश करने वाले हैं। अब आप कृपा करके माघ
शुक्ल एकादशी का वर्णन कीजिए।
इसका क्या नाम है, इसके व्रत
की क्या विधि है और इसमें कौन से
देवता का पूजन किया जाता है?
श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन्! इस
एकादशी का नाम 'जया एकादशी' है।
इसका व्रत करने से मनुष्य ब्रह्म हत्यादि पापों से
छूट कर मोक्ष को प्राप्त होता है तथा इसके
प्रभाव से भूत, पिशाच आदि योनियों से मुक्त
हो जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक
करना चाहिए। अब मैं तुमसे पद्मपुराण में वर्णित
इसकी महिमा की एक कथा सुनाता हूँ।
देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और अन्य सब
देवगण सुखपूर्वक स्वर्ग में रहते थे। एक समय इंद्र
अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ
विहार कर रहे थे और गंधर्व गान कर रहे थे। उन
गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत
तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन
तथा उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे।
साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और
उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे।
पुष्पवती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस
पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण
चलाने लगी। उसने अपने रूप लावण्य और हावभाव
से माल्यवान को वश में कर लिया। हे राजन्! वह
पुष्पवती अत्यन्त सुंदर थी। अब वे इंद्र को प्रसन्न
करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित
हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित
हो गया था।
इनके ठीक प्रकार न गाने तथा स्वर ताल ठीक
नहीं होने से इंद्र इनके प्रेम को समझ गया और
उन्होंने इसमें अपना अपमान समझ कर उनको शाप
दे दिया। इंद्र ने कहा हे मूर्खों ! तुमने
मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए
तुम्हारा धिक्कार है। अब तुम दोनों स्त्री-पुरुष
के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण
करो और अपने कर्म का फल भोगो।
इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वे अत्यन्त दु:खी हुए और
हिमालय पर्वत पर दु:खपूर्वक अपना जीवन
व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श
आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं था।
वहाँ उनको महान दु:ख मिल रहे थे। उन्हें एक क्षण
के लिए भी निद्रा नहीं आती थी।
उस जगह अत्यन्त शीत था, इससे उनके रोंगटे खड़े
रहते और मारे शीत के दाँत बजते रहते। एक दिन
पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि पिछले जन्म
में हमने ऐसे कौन-से पाप किए थे, जिससे
हमको यह दु:खदायी पिशाच योनि प्राप्त
हुई। इस पिशाच योनि से तो नर्क के दु:ख
सहना ही उत्तम है। अत: हमें अब किसी प्रकार
का पाप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार
विचार करते हुए वे अपने दिन व्यतीत कर रहे थे।
दैव्ययोग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष
की जया नामक एकादशी आई। उस दिन उन्होंने
कुछ भी भोजन नहीं किया और न कोई पाप कर्म
ही किया। केवल फल-फूल खाकर ही दिन
व्यतीत किया और सायंकाल के समय महान
दु:ख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस समय सूर्य
भगवान अस्त हो रहे थे। उस रात को अत्यन्त ठंड
थी, इस कारण वे दोनों शीत के मारे
अति दुखित होकर मृतक के समान आपस में चिपटे
हुए पड़े रहे। उस
रात्रि को उनको निद्रा भी नहीं आई।
हे राजन् ! जया एकादशी के उपवास और
रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते
ही उनकी पिशाच योनि छूट गई। अत्यन्त सुंदर
गंधर्व और अप्सरा की देह धारण कर सुंदर
वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर उन्होंने स्वर्गलोक
को प्रस्थान किया। उस समय आकाश में
देवता उनकी स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे।
स्वर्गलोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र
को प्रणाम किया। इंद्र इनको पहले रूप में देखकर
अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ और पूछने लगा कि तुमने
अपनी पिशाच योनि से किस तरह
छुटकारा पाया, सो सब बतालाओ।
माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र ! भगवान विष्णु
की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से
ही हमारी पिशाच देह छूटी है। तब इंद्र बोले
कि हे माल्यवान! भगवान की कृपा और
एकादशी का व्रत करने से न केवल
तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई, वरन् हम
लोगों के भी वंदनीय हो गए क्योंकि विष्णु
और शिव के भक्त हम लोगों के वंदनीय हैं, अत: आप
धन्य है। अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार
करो।
श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजा युधिष्ठिर ! इस
जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट
जाती है। जिस मनुष्य ने इस एकादशी का व्रत
किया है उसने मानो सब यज्ञ, जप, दान
आदि कर लिए। जो मनुष्य
जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य
ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं।

Saturday, 14 March 2015

quality of vegetables

                           
                              Ginger

Ginger is a treasure of the properties. Cough when mixed with honey to eat it in the past few days will be away from the chronic cough. Ginger with salt before eating food is very beneficial and health protector Mamana. Ginger is commonly found in every home. Most people drink it in tea. It is the specific medicine for many ailments.



  


सब्जियों के गुण

                                   अदरक

अदरक तो गुणों का खजाना है। खांसी आने पर यदि शहद में मिलाकर इसे खाया जाए तो पुरानी से पुरानी खांसी भी कुछ  दिनों में दूर हो जाएगी। भोजन से पहले नमक के साथ अदरक खाना बहुत ही लाभदायक और स्वास्थ्य रक्षक मामाना जाता है। अदरक साधारणतः प्रत्येक घर में मिल जाता है। अधिकतर लोग चाय में डालकर पीते हैं। यह अनेकों रोगों की अचूक औषधि है  ।